नमस्कार दोस्तों, इस ब्लॉग के माध्यम से मैं अपने जीवन के कुछ किस्सों को आप सभी के साथ साझा करने की कोशिश कर रहा हूँ. तो आइये, पहला किस्सा देखते हैं.
बात कुछ दिन पुरानी ही है. रेल यात्रा करते हुए अपने घर भरतपुर, राजस्थान से राजस्थान की राजधानी, pink city, जयपुर जा रहा था. ऑफिस के काम से अक्सर जयपुर आना जाना होता है. अधिकतर मैं सुबह 6 बजे चलने वाली intercity express से जाना पसंद करता हूँ. उस दिन भी, उसी ट्रेन से जा रहा था. रास्ते में एक स्टेशन आता है, बांदीकुई. आज के दिन, मेरी सामने वाली सीट पर एक युवक बैठा हुआ था. खुश था, ऐसा लगा मुझे. बांदीकुई आने से कुछ देर पहले ही, उसने किसी को फ़ोन किया, और अपने पहुचने की सूचना दी. शायद उसे वहीं रुकना था, या, कोई काम था.
बांदीकुई आया, वो बाहर की ओर गया, और वापस आया. इस बार वो अकेला नहीं, बल्की, लगभग 4 साल की एक बच्ची थी साथ में. एक दम गुडिया जैसी लग रही थी. मैंने बाहर देखा, क्यूँकी, वो बच्ची अकेली तो आयी नहीं होगी. बाहर देखा, तो एक और युवक बाहर खडा था. एक और बच्चे के साथ. उस बच्चे के पैरों में चप्पल भी नहीं थी. फिर बच्ची को देखा, जो अंदर थी. उसने चमचमाते हुए प्यारे से जूते पहने हुए थे. शायद वो बच्चा, जल्दी जल्दी में पैरों में बिना कुछ पहने ही आ गया. तभी नज़र गयी, उस बाहर खड़े मासूम से बच्चे की आसुंओ पर. शायद अपनी बहन को विदा करने में दुखी था. तभी, उसको थामे हुए जो युवक था, वो एक दम से अपना चेहरा दूसरी और करते हुए आगे बढ गया. लेकिन, इस बार, वो भी अपने आसुंओ को पोछता हुआ नज़र आया. युवक की आखों में आंसू देख कर, वो बच्चा और जोरों से बिलख पडा. उसकी समझ नहीं आ रहा था, कि वो खुद को संभाले, या अपने पापा को. (शायद वो युवक उस बच्चे के पिता रहें हों.) युवक ने जैसे तैसे अपने आसूं पौछे और बच्चे को लेके आगे चल दिया. अब अन्दर देखा. बच्ची, जो बड़ी शांत थी, अचानक, उसका चेहरा भी रोया सा हो गया. उसके पिटा जी, वो अपने आसूं बस जैसे-तैसे रोक रहे थे. बच्ची बार बार अपने पिता की ओर देख रही थी. जैसे ही बच्ची देखती, पिता हल्का सा मुस्कुरा जाता, और फिर बच्ची मुस्कुरा जाती. लेकिन, दोनो ही, अपने अपने आसूं रोके हुए थे. बच्ची ने जैसे तैसे अपना चेहरा नीचे कर कुछ आंसू बहा दिए, और पिता, आखे बंद करके बैठा रहा कुछ देर.
इस सब में, अचानक मैं भी थोडा भावुक हो गया. बस सोच रहा था.. कि इस भाग दौड़ की ज़िंदगी में, जहां रिश्तों का मतलब जैसे खो सा गया है, वहां ऐसा आपसी प्रेम, सच में, एक अलग ही अनुभूती दे गया. दोनों युवकों के बीच जो भी रिश्ता रहा हो, शायद भाई हों, लेकिन, ऐसी भावुक विदाई देख के, आखों के आसूं कुछ कोशिश कर के मुझे भी रोकने पड़े. काफी देर तक उन्हीं को सोचता रहा.. बीच बीच में इस भावनात्मक प्रेम को सोच के हल्का सा मुस्कुरा जाता था.
लेकिन कुछ देर बाद, वापस अपनी भाग दौड़ भरी दुनिया में खो गया मैं. जहाँ हर रिश्ता बेमानी सा लगता है कभी कभी..
बात कुछ दिन पुरानी ही है. रेल यात्रा करते हुए अपने घर भरतपुर, राजस्थान से राजस्थान की राजधानी, pink city, जयपुर जा रहा था. ऑफिस के काम से अक्सर जयपुर आना जाना होता है. अधिकतर मैं सुबह 6 बजे चलने वाली intercity express से जाना पसंद करता हूँ. उस दिन भी, उसी ट्रेन से जा रहा था. रास्ते में एक स्टेशन आता है, बांदीकुई. आज के दिन, मेरी सामने वाली सीट पर एक युवक बैठा हुआ था. खुश था, ऐसा लगा मुझे. बांदीकुई आने से कुछ देर पहले ही, उसने किसी को फ़ोन किया, और अपने पहुचने की सूचना दी. शायद उसे वहीं रुकना था, या, कोई काम था.
बांदीकुई आया, वो बाहर की ओर गया, और वापस आया. इस बार वो अकेला नहीं, बल्की, लगभग 4 साल की एक बच्ची थी साथ में. एक दम गुडिया जैसी लग रही थी. मैंने बाहर देखा, क्यूँकी, वो बच्ची अकेली तो आयी नहीं होगी. बाहर देखा, तो एक और युवक बाहर खडा था. एक और बच्चे के साथ. उस बच्चे के पैरों में चप्पल भी नहीं थी. फिर बच्ची को देखा, जो अंदर थी. उसने चमचमाते हुए प्यारे से जूते पहने हुए थे. शायद वो बच्चा, जल्दी जल्दी में पैरों में बिना कुछ पहने ही आ गया. तभी नज़र गयी, उस बाहर खड़े मासूम से बच्चे की आसुंओ पर. शायद अपनी बहन को विदा करने में दुखी था. तभी, उसको थामे हुए जो युवक था, वो एक दम से अपना चेहरा दूसरी और करते हुए आगे बढ गया. लेकिन, इस बार, वो भी अपने आसुंओ को पोछता हुआ नज़र आया. युवक की आखों में आंसू देख कर, वो बच्चा और जोरों से बिलख पडा. उसकी समझ नहीं आ रहा था, कि वो खुद को संभाले, या अपने पापा को. (शायद वो युवक उस बच्चे के पिता रहें हों.) युवक ने जैसे तैसे अपने आसूं पौछे और बच्चे को लेके आगे चल दिया. अब अन्दर देखा. बच्ची, जो बड़ी शांत थी, अचानक, उसका चेहरा भी रोया सा हो गया. उसके पिटा जी, वो अपने आसूं बस जैसे-तैसे रोक रहे थे. बच्ची बार बार अपने पिता की ओर देख रही थी. जैसे ही बच्ची देखती, पिता हल्का सा मुस्कुरा जाता, और फिर बच्ची मुस्कुरा जाती. लेकिन, दोनो ही, अपने अपने आसूं रोके हुए थे. बच्ची ने जैसे तैसे अपना चेहरा नीचे कर कुछ आंसू बहा दिए, और पिता, आखे बंद करके बैठा रहा कुछ देर.
इस सब में, अचानक मैं भी थोडा भावुक हो गया. बस सोच रहा था.. कि इस भाग दौड़ की ज़िंदगी में, जहां रिश्तों का मतलब जैसे खो सा गया है, वहां ऐसा आपसी प्रेम, सच में, एक अलग ही अनुभूती दे गया. दोनों युवकों के बीच जो भी रिश्ता रहा हो, शायद भाई हों, लेकिन, ऐसी भावुक विदाई देख के, आखों के आसूं कुछ कोशिश कर के मुझे भी रोकने पड़े. काफी देर तक उन्हीं को सोचता रहा.. बीच बीच में इस भावनात्मक प्रेम को सोच के हल्का सा मुस्कुरा जाता था.
लेकिन कुछ देर बाद, वापस अपनी भाग दौड़ भरी दुनिया में खो गया मैं. जहाँ हर रिश्ता बेमानी सा लगता है कभी कभी..